राष्ट्रीय लोक कला व जनजातीय चित्रकला शिबिर का आयोजन खजुराहो में

Chhatarpur Madhya Pradesh

खजुराहो (निर्णय तिवारी) पर्यटन स्थल खजुराहो में 43 अंतर्राष्टीय महोत्सव में लोककला का प्रदर्शन बर्षो से होता आ रहा है इस लोकनृत्य को देखने सम्पूर्ण भारत व पूरी दुनिया से सैलानी आते है। पर इस बर्ष 20 से 26 फरवरी 2017 तक चलने वाले लोकनृत्य के साथ ही चित्रकला का आयोजन भी म्यूजियम में किया गया। इस आदिवासी लोक कला एवं बोली विकास अकादमी ( म.प्र. शासन संस्कृति विभाग) के आदिवर्त, जनजातीय लोक कला राज्य संग्रहालय खजुराहो में  जनजातीय और लोक कला पर एकाग्र चित्र शिविर का शुभारम्भ के अवसर पर ग्वालियर कलम के वरिष्ठ चित्रकार श्री गुणसागर सत्यार्थी, पर्यटन विभाग के क्षेत्रीय प्रबंधक श्री एम़ जोसेफ जी, शिल्पग्राम प्रबंधक श्री गणपत प्रजापति जी, श्री शैलेष सिंह जी, एवं संग्रहालय प्रभारी डॉ. महेशचन्द्र शांडिल्य एवं आमंत्रित सभी कलाकार उपस्थित रहे म्यूजियम को 12 से 6 किसी भी पर्यटको का प्रवेस  निशुल्क रखा गया है।  चित्र शिविर में गोण्ड, भील, उरॉव, मुरिया जनजाति के चत्रकारो में डिंडौरी के सुखनंदि ब्यास, सुरेश धुर्ते, छोटी तेकाम, देवलाल, गंगोत्री तेकाम, इंदौर से मीना श्रावण, पिसाडू, शंकर बस्तर, शांताबाई उज्जैन, सीता मेंढा, शांता भूरिया, सरमा बारिया -झाबुआ, आग्नेस केरकेहा- सरगुजा, रामजी विश्वकर्मा- ओरछा, गुणसागर- टीकमगढ़ आये प्रतिभागियों ने हिस्सेदारी ली।

मालवी बुंदेली और ग्वालियर कलम के पारंम्परिक चित्रकारों के साथ ही राजा मानसिंह महाविद्यालयीन ग्वालियर के  छात्रों में बिकाश भारती, नरेंद्र जाटव, दिशा मिश्रा, प्रह्लाद,गौरव आदि छात्रो द्वारा कलाकारों से सम्वाद एवं सह-प्रशिक्षण भी लिया जायेगा । इस अदभुद चित्रकारी को देखने के लिए भारी मात्रा में देशी व विदेशी पर्यटको व सैलानियो का आना जाना लगा रहा चित्रकारो द्वारा की गई अद्भुद चित्रकारी ने सभी मन अचंभित और आस्चर्य चकित करके रख दिया संग्रहालय प्रभारी डॉ। महेशचंद्र शांडिल्य से जानकारी लेने पर बताया गया की  चित्रकला भारत की कलाएं और हस्‍तशिल्‍प हमेशा से ही इसकी सांस्‍कृतिक और परम्‍परागत प्रभावशीलता को अभिव्‍यक्‍त करने का एक ससक्त माध्‍यम बने रहे हैं। देश भर में फैले इसके 35 राज्‍यों और संघ राज्‍य क्षेत्रों की अपनी विशेष सांस्‍कृतिक और पारम्‍परिक पहचान है, जो वहां प्रचलित कला के भिन्‍न-भिन्‍न रूपों में दिखाई देती है। भारत के हर प्रदेश में कला की अपनी एक विशेष शैली और पद्धति है जिसे लोक कला के नाम से जाना जाता है। लोककला के अलावा भी परम्‍परागत कला का एक अन्‍य रूप है जो अलग-अलग जनजातियों और देहात के लोगों में प्रचलित है। भारत की लोक और जनजातीय कलाएं बहुत ही पारम्‍परिक और साधारण होने पर भी इतनी सजीव और प्रभावशाली है जिन्हें देखकर भूलीबिसरी परम्परा का अनुभव स्वत ही हो जाती है ।

परम्‍परागत सौंदर्य भाव और प्रामाणिकता के कारण भारतीय लोक कला की अंतरराष्‍ट्रीय बाज़ार में संभावना बहुत प्रबल है। भारत की ग्रामीण लोक चित्रकारी के डिज़ाइन बहुत ही सुन्‍दर हैं जिसमें धार्मिक और आध्‍यात्मिक चित्रों को उभारा गया है। कला के उत्‍थान के लिए किए गए भारत सरकार और अन्‍य संगठनों के सतत प्रयासों की वजह से ही लोक कला की भांति जनजातीय कला में पर्याप्‍त रूप से प्रगति हुई है। जनजातीय कला सामान्‍यत: ग्रामीण इलाकों में देखी गई उस सृजनात्‍मक ऊर्जा को प्रतिबिम्बित करती है जो जनजातीय लोगों को शिल्‍पकारिता के लिए प्रेरित करती है। जनजातीय कला कई रूपों में मौजूद है जैसे कि भित्ति चित्र, उत्सव चित्र, शोक चित्र आदि।

Leave a Reply